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1857 से पहले ही वेल्लोर में हिली थी अंग्रेजों की सत्ता! 9 घंटे में बजा था बगावत का बिगुल

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वेल्लोर विद्रोह: 1857 से पहले ही अंग्रेजों को चुनौती दे चुके थे हमारे सिपाही!

10 जुलाई, 1806… ये तारीख भारतीय इतिहास में क्यों खास है? क्योंकि इसी दिन तमिलनाडु के वेल्लोर में हमारे सिपाहियों ने अंग्रेजों को बता दिया था कि “अब बस हो चुका!” सच कहूं तो ये कोई छोटी-मोटी बगावत नहीं थी – सिपाहियों ने तो पूरे 9 घंटे तक वेल्लोर किले पर कब्जा जमाए रखा! और हैरानी की बात ये कि ये सब 1857 की क्रांति से पूरे 51 साल पहले हो चुका था। सोचिए, अंग्रेजों की नींव तब हिल गई थी जब हमें ‘आजादी की लड़ाई’ शुरू होने में अभी आधी सदी बाकी थी!

क्या सच में पगड़ी और दाढ़ी से शुरू हुआ था ये विद्रोह?

असल में बात तो धर्म की थी। अंग्रेजों ने सिपाहियों को पगड़ी और दाढ़ी हटाने का हुक्म दिया – जो हिंदू और मुस्लिम दोनों के लिए धर्म के खिलाफ था। मतलब साफ था – “हमारी पहचान मिटाने की कोशिश”। और फिर टीपू सुल्तान के परिवार को वहीं किले में कैद करना… ये सब मिलकर ऐसा विस्फोट हुआ कि बस, सिपाहियों का गुस्सा फूट पड़ा। क्या आपको नहीं लगता कि ये सिर्फ पगड़ी का मामला नहीं, बल्कि हमारी अस्मिता की लड़ाई थी?

वो 9 घंटे जिन्होंने इतिहास बदल दिया

सुबह के 5 बजे… अचानक किले में हलचल शुरू। सिपाहियों ने अंग्रेज अफसरों पर हमला बोल दिया। और फिर क्या? टीपू सुल्तान का झंडा फहराते हुए वेल्लोर किले पर कब्जा! पर दिक्कत ये रही कि मद्रास से अंग्रेजी फौज आ गई। और फिर? खैर… अंग्रेजों ने तो अपनी रीति-नीति से काम लिया – सैकड़ों सिपाहियों को फाँसी पर लटका दिया। क्रूर? बिल्कुल। लेकिन ये विद्रोह कभी भुलाया नहीं जा सकेगा।

इतिहासकार क्या कहते हैं?

डॉ. पिल्लई का कहना है – “ये 1857 की क्रांति का पूर्वाभास था।” पर सच तो ये है कि हमारे इतिहास की किताबों में इसे जगह ही नहीं मिली। और अंग्रेजों ने तो इसे ‘सिपाहियों का सनक’ तक कह डाला! सोचिए न, कैसे हमारे संघर्ष को छोटा करके दिखाया गया। प्रो. सेनगुप्ता सही कहती हैं – ये धार्मिक अस्मिता की लड़ाई थी।

आज क्या हो रहा है?

अच्छी खबर ये कि अब इस विद्रोह को उसका हक दिलाने की मुहिम चल रही है। तमिलनाडु सरकार वेल्लोर किले को राष्ट्रीय विरासत घोषित करने जा रही है। और textbooks में जगह मिले, इसके लिए लोग जोर-शोर से मांग कर रहे हैं। क्योंकि ये सिर्फ इतिहास नहीं, हमारे गौरव की कहानी है।

तो देखा आपने? 1857 से पहले ही हमारे सिपाहियों ने अंग्रेजों को चुनौती दे दी थी। ये विद्रोह साबित करता है कि आजादी की चिंगारी बहुत पहले ही भड़क चुकी थी। और हाँ, अब समय आ गया है कि वेल्लोर के इन वीरों को वो सम्मान मिले जिसके वो हकदार हैं। क्या आप सहमत नहीं?

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1. Vellore की बगावत कब हुई थी और ये 1857 से पहले कैसे हुई?

सुनकर हैरानी होगी, लेकिन Vellore का यह विद्रोह 10 जुलाई 1806 को हुआ था – यानी 1857 से पूरे 51 साल पहले! असल में, यह भारत में अंग्रेजों के खिलाफ पहली बड़ी सैन्य बगावत थी। सोचिए, उस समय जब 1857 की क्रांति के नायकों के दादा-परदादा भी शायद पैदा नहीं हुए थे, तब हमारे सिपाहियों ने अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दे डाली थी। कमाल की बात है न?

2. इस विद्रोह का मुख्य कारण क्या था?

असल में तो कारण बड़ा ही मजेदार (और दुखद भी) था। अंग्रेजों ने सिपाहियों पर नया dress code थोप दिया था – जिसमें turban पहनने के नियम भी शामिल थे। अब समझिए न, हमारे फौजियों के लिए यह सिर्फ कपड़ों का मसला नहीं था, बल्कि उनकी धार्मिक भावनाओं से जुड़ा मामला था। साथ ही, पहले से ही अंग्रेजों के प्रति गुस्सा तो था ही… बस यही चिंगारी आग बनकर भड़क उठी।

3. क्या यह विद्रोह सफल रहा था?

ईमानदारी से कहूं तो… बिल्कुल नहीं। विद्रोह महज 9 घंटे तक ही चल पाया। अंग्रेजों ने तुरंत कार्रवाई करके इसे दबा दिया। लेकिन यहां दिलचस्प बात यह है कि इस छोटी सी घटना ने एक बड़ी आग को हवा दी। सिपाहियों के दिलों में जो आक्रोश पैदा हुआ, वही आगे चलकर 1857 की महान क्रांति का कारण बना। कभी-कभी छोटी सी चिंगारी भी बड़ी लपटों को जन्म दे देती है, है न?

4. Vellore विद्रोह और 1857 की क्रांति में क्या connection है?

देखा जाए तो Vellore विद्रोह को 1857 की क्रांति का ‘ट्रेलर’ कहना गलत नहीं होगा! दोनों ही मामलों में सिपाहियों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत की थी। और हैरानी की बात यह कि दोनों का कारण भी लगभग एक जैसा था – धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचना। सच तो यह है कि Vellore की यह छोटी सी घटना ही वह बीज थी, जिससे आगे चलकर स्वतंत्रता के विशाल वृक्ष ने जन्म लिया। क्या आपको नहीं लगता कि इतिहास में यह घटना उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी कि 1857 की क्रांति?

Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com

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