56 साल पहले VV गिरी का इस्तीफा: जब CJI ने संभाली थी उपराष्ट्रपति की जिम्मेदारी
क्या आपको याद है? भारतीय राजनीति में इस्तीफों का चलन नया नहीं है, लेकिन जगदीप धनखड़ का हालिया कदम हमें 1969 में ले गया है। वो दौर जब VV गिरी ने राष्ट्रपति बनने के लिए उपराष्ट्रपति पद छोड़ दिया था। है न दिलचस्प? आज भी वही सवाल उठ रहा है – CJI क्या फिर से यह भूमिका निभाएंगे?
एक ऐतिहासिक निर्णय की पृष्ठभूमि
1969 की बात करें तो… VV गिरी ने जो किया, उसे साहसिक ही कहा जाएगा। सोचिए, उपराष्ट्रपति पद छोड़कर राष्ट्रपति चुनाव में उतरना! असल में यही वो मौका था जब संविधान का अनुच्छेद 65 सचमुच काम आया। और फिर CJI हिदायतुल्ला ने उपराष्ट्रपति की जिम्मेदारी संभाली। क्या आप जानते हैं? यह भारतीय लोकतंत्र का वो पल था जब हमने देखा कि हमारी व्यवस्था कितनी मजबूत है।
वर्तमान परिदृश्य और ऐतिहासिक समानताएं
अब धनखड़ साहब ने भी यही रास्ता चुना है। तीसरे उपराष्ट्रपति जिन्होंने पद छोड़ा। लेकिन यहां सवाल यह है – क्या 1969 जैसी स्थिति फिर बनेगी? संसद में चुनाव प्रक्रिया तो शुरू होगी, पर इस बीच क्या होगा? देखा जाए तो यह सिर्फ एक प्रक्रिया नहीं, बल्कि हमारे संविधान की परीक्षा है।
राजनीतिक और संवैधानिक प्रतिक्रियाएं
राजनीतिक गलियारों में तो हंगामा मचा हुआ है। विपक्ष कह रहा है – “संवैधानिक संकट!” वहीं experts की राय है कि नियमों का पालन जरूरी है। सोशल मीडिया पर तो बवाल है – #VPResignation ट्रेंड कर रहा है। कुछ लोग इसे इतिहास दोहराने जैसा मान रहे हैं, तो कुछ का कहना है कि हमारा लोकतंत्र और परिपक्व हुआ है। आप क्या सोचते हैं?
भविष्य की संभावनाएं
अब सबकी नजरें राष्ट्रपति मुर्मू पर हैं। वो ही तो नई प्रक्रिया शुरू करेंगी। मजे की बात यह कि अगर देरी हुई तो CJI फिर से कार्यवाहक की भूमिका में आ सकते हैं। सच कहूं तो यह मामला सिर्फ एक इस्तीफे से कहीं बड़ा है। यह तो एक नई बहस की शुरुआत है – भविष्य में ऐसे मामलों को कैसे हैंडल किया जाए?
अंत में बस इतना – धनखड़ के इस कदम ने हमें 1969 की याद दिला दी। उस वक्त भी हमारे संवैधानिक तंत्र ने अपनी मजबूती दिखाई थी। अब देखना यह है कि यह नया अध्याय कैसे लिखा जाता है। क्योंकि लोकतंत्र की खूबसूरती यही तो है – हर बार एक नया सबक, एक नई कहानी।
VV गिरी का इस्तीफा और CJI की अनोखी भूमिका – जानिए पूरी कहानी
VV गिरी ने 56 साल पहले इस्तीफा क्यों दिया? असल में क्या हुआ था?
देखिए, बात 1967 की है। VV गिरी उपराष्ट्रपति थे, लेकिन उनका दिल तो राष्ट्रपति बनने का कर रहा था। तो क्या किया? उन्होंने एक बोल्ड मूव किया – पद छोड़कर चुनाव लड़ने का फैसला! बिल्कुल वैसे ही जैसे कोई खिलाड़ी टीम छोड़कर कप्तान बनने की रेस में उतर जाए। सच्ची राजनीतिक महत्वाकांक्षा, है न?
CJI ने उपराष्ट्रपति की कुर्सी संभाली? ये कैसे हुआ?
अब यहाँ मजेदार ट्विस्ट आता है। जब VV गिरी ने इस्तीफा दिया, तो Chief Justice of India (CJI) हिदायतुल्लाह साहब ने कार्यवाहक उपराष्ट्रपति की जिम्मेदारी संभाली। सुनने में अजीब लगता है न? पर सच है! यह भारतीय इतिहास का शायद पहला और आखिरी मौका रहा जब CJI ने यह भूमिका निभाई। संविधान की खूबसूरती यही है – हर स्थिति के लिए एक रास्ता!
क्या VV गिरी को मिली थी सफलता? जानिए नतीजा
अरे हाँ भई! 1969 का वो चुनाव तो इतिहास बन गया। VV गिरी ने न सिर्फ चुनाव लड़ा, बल्कि जीतकर भारत के चौथे राष्ट्रपति बने। और 1974 तक उन्होंने इस पद को गरिमा से संभाला भी। सोचिए, अगर उस वक्त इस्तीफा न देते तो शायद यह मौका हाथ से निकल जाता। जोखिम उठाने वालों के लिए एक सबक, है न?
इस पूरे प्रकरण का क्या है महत्व? असली सबक क्या है?
देखा जाए तो यह घटना सिर्फ एक इस्तीफे से कहीं बड़ी है। पहली बार CJI ने कार्यवाहक उपराष्ट्रपति की भूमिका निभाई – यह हमारे संविधान की लचीलेपन की मिसाल है। और साथ ही, यह न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच के नाजुक रिश्ते को भी दिखाता है। ईमानदारी से कहूं तो, आज के दौर में ऐसी घटनाएं हमें याद दिलाती हैं कि हमारा संवैधानिक ढांचा कितना मजबूत और सक्षम है। एकदम ज़बरदस्त। सच में।
Source: Navbharat Times – Default | Secondary News Source: Pulsivic.com