क्या लेऑफ़्स का मतलब हमेशा स्टॉक्स का उछाल होता है? सच्चाई जानकर चौंक जाएंगे!
अजीब बात है ना? भारतीय IT कंपनियाँ इन दिनों एक तरफ तो लेऑफ़्स (छंटनी) कर रही हैं, लेकिन दूसरी तरफ उनके शेयरों में वो धमाकेदार ग्रोथ नहीं दिख रही जिसकी उम्मीद की जाती थी। ये तो वैसा ही हुआ जैसे कोई डॉक्टर बीमारी का इलाज करे और मरीज और बीमार हो जाए! पुराने जमाने के इकोनॉमिक्स के नियम कहते थे कि छंटनी से कंपनी का फायदा बढ़ता है, लेकिन अब ये फॉर्मूला काम नहीं कर रहा। क्यों? इसकी दो बड़ी वजहें हैं – AI का भूत और वैश्विक अर्थव्यवस्था की हालत। अब सिर्फ कर्मचारियों को निकाल देने भर से शेयर प्राइस नहीं चढ़ता। है ना मजेदार बात?
पुरानी सोच vs नई रियलिटी
सालों तक हमने सुना कि लेऑफ़्स कंपनी के लिए “कड़वी दवा” होती है। लेकिन अब ये दवा काम ही नहीं कर रही! असल में देखा जाए तो पहले का लॉजिक सीधा था – कर्मचारी कम = खर्च कम = मुनाफा ज्यादा = शेयर ऊपर। पर अब TCS, Infosys जैसी कंपनियों के सामने दिक्कत ये है कि AI और automation ने तो पूरा गेम ही बदल दिया है। अब सवाल ये नहीं कि कितने लोगों को निकाला, बल्कि ये कि कितनी तेजी से आप नई टेक्नोलॉजी अपना रहे हैं। और ऊपर से ग्लोबल मंदी ने तो मानो नमक छिड़क दिया हो!
2023-24: जब छंटनी के बाद भी शेयर नहीं हुए खुश
पिछले साल IT सेक्टर में हजारों लोगों को गुलाबी चिट्ठी मिली। दो मुख्य वजहें – एक तो AI की धूम, दूसरा विदेशी क्लाइंट्स की जेब पर चोट। लेकिन यहाँ मजा ये है कि शेयर मार्केट ने इसे कोई खास तवज्जो नहीं दी। IT इंडेक्स तो ऐसे ठहरा हुआ है जैसे कोई सुस्त कछुआ! इससे साफ पता चलता है कि अब बाजार सिर्फ लेऑफ़्स देखकर उत्साहित नहीं होता। शायद ये अच्छी बात है, है ना?
एक्सपर्ट्स क्या कहते हैं?
मार्केट एनालिस्ट्स की राय साफ है – अब के जमाने में सिर्फ लेऑफ़्स से काम नहीं चलेगा। नोमुरा रिसर्च के एक विशेषज्ञ ने तो सीधे कहा, “अब AI और ग्लोबल डिमांड ही राजा हैं।” वहीं कर्मचारी यूनियनें गुस्से में हैं – “अनुभवी लोगों को निकालकर कंपनियाँ अपना ही नुकसान कर रही हैं।” और निवेशक? वो तो अब पूरी तरह नई रणनीति पर चल रहे हैं। जैसे कि एक पोर्टफोलियो मैनेजर ने मुझे बताया, “अब हम टेक्नोलॉजी एडॉप्शन और long-term ग्रोथ को ही प्राथमिकता देते हैं।” समझदारी की बात है!
आगे का रास्ता: आसान नहीं, मगर नामुमकिन भी नहीं
सच कहूँ तो IT कंपनियों के लिए अगले कुछ साल आसान नहीं होने वाले। एक तरफ तो उन्हें AI की रेस में बने रहना है, दूसरी तरफ बचे हुए कर्मचारियों को री-स्किल करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर ग्लोबल मार्केट सुधरा तो शेयरों में जान आ सकती है। लेकिन तब तक निवेशकों को मेरी सलाह – सिर्फ छंटनी के आंकड़ों पर मत जाइए। कंपनी की इनोवेशन क्षमता और future-ready स्ट्रैटेजी को समझिए। वरना पछताना पड़ सकता है!
तल्ख सच्चाई: भारतीय IT सेक्टर में अब लेऑफ़्स का मतलब ऑटोमैटिक प्रॉफिट नहीं है। AI और मार्केट अनिश्चितता ने नए नियम लिख दिए हैं। अब जीत उसी की होगी जो न सिर्फ कटौती करे, बल्कि बदलती टेक्नोलॉजी के साथ ताल मिलाकर चल सके। सीधी सी बात – अब बस कर्मचारी निकालने से काम नहीं चलेगा!
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Source: Livemint – Markets | Secondary News Source: Pulsivic.com