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यूके पेंशन ‘ट्रिपल लॉक’ हटाएं या वित्तीय संकट का सामना करें, IFS की चेतावनी

यूके की पेंशन ‘ट्रिपल लॉक’ पर बवाल: क्या सच में खतरे में है अर्थव्यवस्था?

अभी-अभी IFS (इंस्टीट्यूट फॉर फिस्कल स्टडीज) ने एक रिपोर्ट पेश की है जिसने सबको हिलाकर रख दिया है। असल में बात ये है कि यूके की मशहूर ‘ट्रिपल लॉक’ पेंशन स्कीम अब सरकार के लिए सिरदर्द बनती जा रही है। और ये कोई छोटा-मोटा मसला नहीं है – अगर इसे ऐसे ही चलने दिया गया, तो नतीजे भयानक हो सकते हैं। एक तरफ तो पेंशनरों का भला, दूसरी तरफ पूरी अर्थव्यवस्था की सेहत। क्या आपने कभी सोचा था कि पेंशन जैसी चीज इतनी बड़ी राजनीतिक-आर्थिक बहस का केंद्र बन जाएगी?

ट्रिपल लॉक: जादू की छड़ी या जहरीला तोहफा?

देखिए, ट्रिपल लॉक सिस्टम असल में क्या करता है? ये पेंशनरों को महंगाई के थपेड़ों से बचाता है – हर साल उनकी पेंशन या तो 2.5% बढ़ जाती है, या फिर महंगाई दर के हिसाब से, जो भी ज्यादा हो। बढ़िया लगता है न? पर अब मुश्किल ये आ रही है कि बुजुर्गों की आबादी बढ़ रही है, अर्थव्यवस्था ठप पड़ी है, और ये सिस्टम सरकार पर बोझ बनता जा रहा है। ऐसा लगता है जैसे किसी ने पेंशनरों को तो सुरक्षित कर दिया, लेकिन पूरी अर्थव्यवस्था को खतरे में डाल दिया।

और सबसे बड़ी विडंबना ये है कि इसकी कीमत नौजवान पीढ़ी को चुकानी पड़ सकती है। IFS की रिपोर्ट कहती है कि या तो युवाओं की पेंशन कटेगी, या फिर उन पर नए टैक्स थोपे जाएंगे। सोचिए – एक तरफ बेरोजगारी, महंगी एजुकेशन, महंगे घर…और अब ये नया बोझ!

IFS ने क्या सुझाव दिए हैं?

IFS ने तो साफ-साफ कह दिया है – या तो इस ट्रिपल लॉक को खत्म करो, या फिर कम से कम इसमें बदलाव करो। उनके मुताबिक, अगर ये सिस्टम ऐसे ही चलता रहा, तो 2050 तक सरकारी खर्च 40% तक बढ़ सकता है। यानी सीधे शब्दों में – आर्थिक तबाही।

कई एक्सपर्ट्स तो यहां तक कह रहे हैं कि ये सिस्टम अन्यायपूर्ण है। सच भी तो है – जिन युवाओं को आजकल नौकरी मिलने में ही पसीने छूट रहे हैं, उन पर और टैक्स लादकर पेंशनरों को फायदा पहुंचाना कहां का न्याय है? पर सवाल ये भी है कि बुजुर्गों को महंगाई के थपेड़ों के सामने अकेला छोड़ देना क्या सही होगा?

किसका क्या स्टैंड है?

इस मुद्दे पर हर कोई अपनी-अपनी राग अलाप रहा है। वित्त मंत्रालय ने कहा है कि वो रिपोर्ट को गंभीरता से ले रहे हैं, लेकिन फिलहाल ट्रिपल लॉक जारी रहेगा। वहीं पेंशनर संगठनों ने चेतावनी दी है – अगर ये सुरक्षा कवच हटा, तो बुजुर्गों की जिंदगी और मुश्किल हो जाएगी।

कुछ अर्थशास्त्री बीच का रास्ता निकालने की सलाह दे रहे हैं। उनका कहना है कि ‘डबल लॉक’ जैसा कोई विकल्प तलाशा जाए – जहां पेंशन सिर्फ महंगाई या वेतन वृद्धि (जो भी ज्यादा हो) के हिसाब से बढ़े। समझदारी की बात लगती है, है न?

आगे की राह: क्या होगा अगला कदम?

सरकार इस पर गंभीरता से विचार कर रही है, और हो सकता है अगले बजट में कोई बड़ा फैसला आए। अगर ट्रिपल लॉक में बदलाव होता है, तो इसका असर यूके की अर्थव्यवस्था पर दशकों तक दिखेगा।

एक्सपर्ट्स की राय है कि लंबी चौड़ी योजना बनाने की जरूरत है। जनसंख्या के बदलाव, आर्थिक विकास दर, और हर पीढ़ी के हक को ध्यान में रखकर कोई समग्र नीति बनानी होगी। IFS की ये रिपोर्ट तो बस शुरुआत है – असली बहस अब शुरू होने वाली है!

यूके पेंशन का ‘ट्रिपल लॉक’: जानिए वो सब कुछ जो आप जानना चाहते हैं

1. ट्रिपल लॉक है क्या बला?

देखिए, UK की पेंशन सिस्टम में ये ट्रिपल लॉक नाम की चीज़ एक तरह का सेफ्टी नेट है। मतलब? हर साल पेंशनर्स को बढ़ोतरी मिलेगी, लेकिन यहाँ मजा ये है कि ये बढ़ोतरी तीन चीज़ों में से जो सबसे ज़्यादा हो, उसके हिसाब से तय होती है। inflation (यानी महंगाई दर), average earnings (कमाई का औसत), या फिर 2.5%… जो भी इनमें सबसे ऊपर होगा, वही लागू होगा। एक तरह से पेंशनर्स के लिए विन-विन सिचुएशन।

2. IFS क्यों कर रहा है ट्रिपल लॉक पर रोड?

अब यहाँ थोड़ा दिक्कत आने लगा है। IFS (Institute for Fiscal Studies) जैसे संस्थान बता रहे हैं कि ये सिस्टम सरकार के लिए “गले की हड्डी” बनता जा रहा है। सीधे शब्दों में कहें तो – पैसा खत्म हो रहा है! उनका डर है कि अगर ऐसे ही चलता रहा तो financial crisis जैसे हालात पैदा हो सकते हैं। पर सवाल ये है कि क्या सरकार पेंशनर्स को निराश करने का रिस्क लेगी?

3. ट्रिपल लॉक हटा तो… फिर क्या?

ईमानदारी से कहूँ तो, पेंशनर्स के लिए ये बुरी खबर होगी। सालाना बढ़ोतरी कम हो जाएगी, और inflation के दौर में तो खासकर purchasing power पर सीधा असर पड़ेगा। सोचिए – महंगाई बढ़ रही है, पर पेंशन नहीं… तो हालात कैसे होंगे? एकदम अंदाज़ा लगाया जा सकता है।

4. क्या कोई बीच का रास्ता है?

हो सकता है! कुछ एक्सपर्ट्स ‘डबल लॉक’ का आइडिया दे रहे हैं। मतलब? सिर्फ inflation और average earnings के आधार पर बढ़ोतरी। 2.5% वाला ऑप्शन हट जाएगा। सरकार को राहत मिलेगी, पेंशनर्स को भी कुछ न कुछ मिलता रहेगा। पर सच कहूँ तो, ये थोड़ा कम्प्रोमाइज़ वाला सॉल्यूशन लगता है। क्या पता, शायद यही भविष्य हो!

Source: Financial Times – Companies | Secondary News Source: Pulsivic.com

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