सरिस्का टाइगर रिजर्व पर अशोक गहलोत का बड़ा हमला! केंद्र सरकार के फैसले पर उठाए गंभीर सवाल
जयपुर से एक ताज़ा खबर – और ये सीधे राजस्थान की राजनीति को हिला देने वाली है। अशोक गहलोत, जिन्हें हम सब राजनीति के उस दौर से जानते हैं जब पर्यावरण और विकास की बहसें सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं थीं, एक बार फिर मैदान में उतरे हैं। और इस बार निशाने पर है सरिस्का टाइगर रिजर्व में भाजपा सरकार का वो विवादास्पद प्लान। गहलोत साहब तो इसे सीधे-सीधे “पर्यावरणीय आत्मघात” बता रहे हैं। सवाल यह है कि क्या यह सचमुच विकास का प्रोजेक्ट है या फिर…?
विवाद की जड़ क्या है? असल मामला क्या है?
देखिए, सरिस्का सिर्फ एक टाइगर रिजर्व नहीं है। ये राजस्थान की उस आखिरी सांस की तरह है जहाँ बाघ अब भी आज़ाद घूमते हैं। लेकिन अब यहाँ क्या होने वाला है? सरकार चाहती है कि यहाँ बड़े-बड़े रिसॉर्ट्स बनें, नई सड़कें बनें – जिसे वे “पर्यटन infrastructure” कह रहे हैं। पर सच पूछो तो, क्या हम वाकई इसकी कीमत पर्यावरण से चुकाना चाहते हैं?
और तो और, स्थानीय लोगों की आवाज़ भी इस मामले में दबी हुई है। वो कह रहे हैं कि ये सारे प्रोजेक्ट सिर्फ बड़े कॉर्पोरेट घरानों को फायदा पहुँचाएँगे। उनके गाँव, उनकी ज़मीन, उनका पानी – सब खतरे में पड़ जाएगा। सोचिए, क्या यही है असली विकास?
गहलोत का वो तीखा बयान जिसने हवा का रुख बदल दिया
अशोक गहलोत ने बीते बुधवार को जो कहा, वो सुनने लायक था। उन्होंने सीधे शब्दों में कहा, “ये सरकार environmental impact assessment की परवाह किए बिना फैसले थोप रही है।” और सच कहूँ तो, उनके इन शब्दों में दम है। क्योंकि अगर EIA रिपोर्ट ही ठीक से नहीं बनी है, तो फिर ये पूरा खेल किसके हित में चल रहा है?
गहलोत का एक और वाक्य याद रखने वाला था: “ये सरकार बाघों की खाल पर विकास की कहानी लिख रही है।” थोड़ा कड़ा लग सकता है, लेकिन क्या ये सच नहीं है? हम सब जानते हैं कि सरिस्का में बाघों की संख्या पहले से ही कम है। अब और नुकसान?
क्या कह रहा है ग्राउंड रियलिटी?
मैंने कुछ वन्यजीव विशेषज्ञों से बात की तो पता चला – सच्चाई डरावनी है। एक विशेषज्ञ ने बताया, “सरिस्का का पूरा इकोसिस्टम ही खतरे में पड़ जाएगा।” और ये सिर्फ बाघों की बात नहीं है। पूरा फूड चेन, पानी के सोर्स, यहाँ तक कि हवा का प्रवाह भी बदल सकता है। Scary, isn’t it?
लेकिन दूसरी तरफ, सरकारी अधिकारी कुछ और ही गाना गा रहे हैं। उनका कहना है कि “सस्टेनेबल डेवलपमेंट” होगा। पर सवाल ये है कि क्या वाकई? क्योंकि अब तक जो दस्तावेज़ सामने आए हैं, उनमें इस बात का कोई ठोस प्रमाण नहीं है।
अब आगे क्या? राजनीति गरमाने वाली है!
गहलोत ने तो संकेत दे दिया है – ये मामला अब दिल्ली तक जाएगा। और 2024 के चुनाव को देखते हुए, कांग्रेस इस मुद्दे को हाथ से जाने नहीं देगी। पर्यावरण दिवस पर तो शायद बड़ा प्रदर्शन हो। क्या भाजपा इसके लिए तैयार है?
और हाँ, एक बात और। अगर स्थानीय लोग सड़कों पर उतर आए, तो सरकार को झुकना पड़ सकता है। इतिहास गवाह है – ऐसे प्रोजेक्ट्स अक्सर जनविरोध के आगे फेल हो जाते हैं। देखना ये है कि इस बार क्या होता है।
अंत में सिर्फ इतना – ये सिर्फ सरिस्का की लड़ाई नहीं है। ये पूरे देश में चल रहे development vs environment के उस बड़े युद्ध का एक नया अध्याय है। और जैसे-जैसे 2024 नज़दीक आएगा, ये बहस और गरमाती दिखेगी। आपका क्या ख्याल है? कमेंट में ज़रूर बताइएगा।
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अशोक गहलोत ने सरिस्का टाइगर रिजर्व के नए नियमों पर जो सवाल उठाए हैं, उन्हें सिर्फ पर्यावरण की बहस तक सीमित नहीं रखा जा सकता। असल में, यहाँ राजनीति और संरक्षण के बीच का वो पुराना टकराव फिर से सामने आया है, जिसे हम अक्सर देखते रहते हैं।
सोचने वाली बात यह है कि क्या वाकई में ये नियम जंगल और बाघों की सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं, या फिर कहीं पीछे कोई और गेम चल रहा है? मेरा मतलब, हम सब जानते हैं कि ऐसे मामलों में अक्सर विकास के नाम पर कुछ और ही होता रहा है।
अब सवाल यह उठता है कि केंद्र सरकार इस पर क्या रुख अपनाएगी? क्योंकि जनता को साफ-साफ पता होना चाहिए कि उनके टैक्स के पैसे से चलने वाले इन प्रोजेक्ट्स में आखिर हो क्या रहा है।
एक तरफ तो हम ‘Save the Tiger’ जैसे कैंपेन चलाते हैं, दूसरी तरफ ऐसे फैसले आते हैं जिन पर सवाल उठना लाज़मी है। थोड़ा अजीब लगता है, है ना?
खैर, देखते हैं आगे क्या होता है। लेकिन इतना तो तय है कि इस बहस का हल पारदर्शिता और ईमानदारी से ही निकलेगा। वरना… वरना हमेशा की तरह जंगल और जनता दोनों ही ठगे जाते रहेंगे।
Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com

