डेविड गर्गन: अमेरिकी राजनीति का वो पुरोधा जिसने चार राष्ट्रपतियों को राह दिखाई
आज एक बुरी खबर आई है। वाशिंगटन के उस ‘गो-टू’ व्यक्ति का, जिस पर चार अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने भरोसा किया, डेविड गर्गन का 83 साल की उम्र में निधन हो गया। सच कहूं तो, अमेरिकी राजनीति का यह ऐसा चेहरा था जिसने न सिर्फ व्हाइट हाउस की नीतियों को आकार दिया बल्कि बाद में TV स्क्रीन्स पर भी अपनी गहरी समझ से लोगों को हैरान कर दिया। और अब? अब तो बस एक बड़ा सवाल रह गया है – क्या कोई दूसरा गर्गन पैदा होगा?
वो शख्स जिसने दोनों पार्टियों का दिल जीता
कल्पना कीजिए – एक ही व्यक्ति जो निक्सन के साथ भी काम करे और क्लिंटन का भी विश्वासपात्र रहे! गर्गन साहब ने यह करिश्मा कर दिखाया। 1942 में जन्मे इस हार्वर्ड लॉ ग्रेजुएट ने पहले नौसेना में देश सेवा की, फिर वाशिंगटन की गलियों में राजनीति का ककहरा सीखा।
असल में बात ये है कि आजकल तो राजनीति में दूसरे पक्ष वाले को शैतान बताने का चलन है। लेकिन गर्गन? उन्होंने रिपब्लिकन और डेमोक्रेट दोनों के साथ काम किया। रीगन से लेकर फोर्ड तक – सबके सब उनकी सलाह को तवज्जो देते थे। क्या आज के ज़माने में ऐसा संभव है? शायद नहीं।
TV स्क्रीन्स से क्लासरूम्स तक – एक अनूठी यात्रा
राजनीति से हटने के बाद भी गर्गन थमे नहीं। CNN पर उनके विश्लेषण देखकर लगता था जैसे राजनीति का कोई जादूगर बोल रहा हो। और हार्वर्ड? वहां तो उन्होंने नए नेताओं को गढ़ने का काम किया। एक तरफ तो TV की चकाचौंध, दूसरी तरफ क्लासरूम की गंभीरता – दोनों को संभालना हर किसी के बस की बात नहीं।
आखिरी विदाई और वो सब जो बाकी रह गया
18 मई को उन्होंने आखिरी सांस ली। परिवार ने जो बयान जारी किया, उसमें दर्द था, गर्व था, और एक खालीपन भी। बिल क्लिंटन से लेकर वुल्फ ब्लिट्जर तक – सभी ने उन्हें याद किया। CNN के उस दिग्गज एंकर ने तो ट्वीट कर ही दिया – “अब राजनीतिक विश्लेषण का स्वाद ही बदल जाएगा।”
क्या छोड़ गए गर्गन?
एक अजीब सी बात है – जब ऐसे लोग जाते हैं, तब उनकी किताबें फिर से बिकने लगती हैं। उनकी आत्मकथा तो अब फिर से ट्रेंड कर रही है। और सोचिए, हो सकता है आने वाले दिनों में कोई ‘गर्गन फेलोशिप’ शुरू हो! पर एक बात तय है – राजनीतिक सलाहकारों की अगली पीढ़ी के लिए वो एक आदर्श बन चुके हैं।
अंत में बस इतना कहूंगा – गर्गन साहब ने साबित कर दिया कि सच्ची राजनीतिक समझ पार्टी लाइन्स से ऊपर होती है। और यही सबक, आज के इस ध्रुवीकृत दौर में, शायद उनकी सबसे बड़ी विरासत है।
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डेविड गर्गन… नाम सुनते ही वाशिंगटन की राजनीति की दुनिया में एक विश्वसनीय चेहरा याद आता है। सच कहूं तो, अमेरिकी राजनीति में ऐसे लोग कम ही होते हैं जो चार राष्ट्रपतियों को सलाह देने का मौका पाते हैं। और गर्गन सिर्फ सलाहकार नहीं थे – वो एक स्तंभ थे। ऐसा लगता था जैसे व्हाइट हाउस की दीवारों को भी उन पर भरोसा था!
83 साल की उम्र में उनका चले जाना… है ना कितना दुखद? लेकिन सोचिए, एक तरफ तो दुख है, दूसरी तरफ वो अनमोल विरासत है जो उन्होंने छोड़ी। अमेरिका ही क्यों, पूरी दुनिया के लिए यह नुकसान है। मेरा मानना है कि असली महान लोग वो होते हैं जिनकी सीख समय के साथ और भी प्रासंगिक होती जाती है। और गर्गन साहब तो इसकी जीती-जागती मिसाल हैं।
आज जब कोई युवा राजनीति में करियर बनाने की सोचे, तो गर्गन का जीवन उसके लिए रोल मॉडल से कम नहीं। सच कहूं तो? यही तो किसी की सच्ची विरासत होती है – जो पीढ़ियों तक प्रेरणा देती रहे।
डेविड गर्गन के बारे में वो सवाल जो हर कोई पूछता है
डेविड गर्गन कौन थे? असल में, इतने खास क्यों थे ये शख्स?
देखिए, वाशिंगटन की दुनिया में अगर कोई ‘गॉडफादर’ हो सकता है तो वो डेविड गर्गन थे। एक political advisor जिसने चार-चार अमेरिकी राष्ट्रपतियों (हाँ, निक्सन से लेकर क्लिंटन तक!) को सलाह दी। पर सिर्फ यही नहीं, media की दुनिया में भी उनका दबदबा था। सच कहूँ तो, वो एक rare कॉम्बो थे – राजनीति का brain और मीडिया का चेहरा।
डेविड गर्गन की मौत कैसे हुई? कोई राज़ तो नहीं था?
83 साल की उम्र में natural causes से चले गए। परिवार ने किसी खास बीमारी का जिक्र नहीं किया। मतलब? एक पूरी जिंदगी जीने के बाद शायद बस वक्त आ गया था। हालांकि, इतने बड़े शख्सियत के लिए यह खबर काफी simple लगती है, है न?
टीवी पर कहाँ-कहाँ दिखते थे गर्गन? क्या आपने भी देखा होगा!
अरे भई, CNN का “Inside Politics” तो उनका second home था! Regular analyst के तौर पर उनकी बातें सुनना एक experience था। “US News & World Report” में भी उनके लेख छपते थे। एक तरह से वो पत्रकारिता और राजनीति के बीच का पुल थे।
डेविड गर्गन ने दुनिया को क्या दिया? आज भी क्यों याद किए जाते हैं?
सुनिए, अगर आज कोई राष्ट्रपति बोलता है तो उसके पीछे गर्गन की छाप हो सकती है। Presidential communications को shape करने में उनका कोई सानी नहीं था। Crisis management? उनकी specialty। Media strategy? उनकी playground। सच तो ये है कि वो एक ऐसा खिलाड़ी थे जिसने game के rules ही बदल दिए।
Source: NY Post – US News | Secondary News Source: Pulsivic.com

