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DU के सिलेबस से हटे हिंदू राष्ट्रवाद और इस्लाम के चैप्टर, जानें क्या बदला?

दिल्ली यूनिवर्सिटी के सिलेबस से गायब हुए हिंदू राष्ट्रवाद और इस्लाम से जुड़े चैप्टर्स – क्या है पूरा मामला?

अरे भई, दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) ने तो हाल ही में बड़ा ही दिलचस्प कदम उठाया है। उन्होंने अपने PG के राजनीति विज्ञान और इतिहास के कोर्सेज से हिंदू राष्ट्रवाद और इस्लाम से जुड़े कुछ अध्यायों को हटा दिया है। सीधे शब्दों में कहें तो – सिलेबस से कट गए ये टॉपिक्स। विश्वविद्यालय का कहना है कि ये “संवेदनशील” या “विवादास्पद” हो सकते हैं। लेकिन सच कहूं तो, ये बहाना किसी को पसंद नहीं आ रहा। शिक्षा जगत में तो इसने नया तूफान ही खड़ा कर दिया है।

पहले भी हो चुके हैं बदलाव, पर इस बार क्यों इतना हंगामा?

देखिए, DU के सिलेबस में बदलाव कोई नई बात नहीं। पर इस बार? बात ही कुछ और है। असल में, जिन टॉपिक्स को हटाया गया, वो सीधे-सीधे हिंदू राष्ट्रवाद, इस्लामिक इतिहास और सांप्रदायिकता से जुड़े थे। अब सवाल यह है कि क्या ये विषय वाकई “अनुपयुक्त” थे? एक्सपर्ट कमेटी तो यही कह रही है। लेकिन कई लोगों को लगता है कि ये सिर्फ विवादों से बचने का तरीका है।

याद कीजिए, DU के सिलेबस को लेकर पहले भी बहस होती रही है। पर इस बार का केस थोड़ा ज्यादा सेंसिटिव इसलिए है क्योंकि इसमें धर्म और राष्ट्रवाद जैसे गर्मागर्म मुद्दों को हटाया गया है। कुछ लोग तो यहां तक कह रहे हैं कि ये छात्रों को एक तरफा पढ़ाने की साजिश हो सकती है। सच्चाई जो भी हो, बात तो बनती है!

क्या-क्या गायब हुआ सिलेबस से? डिटेल्स में जानिए

तो आइए अब जानते हैं कि आखिर क्या हटाया गया। राजनीति विज्ञान के कोर्स से “हिंदू राष्ट्रवाद और आधुनिक भारत” वाले टॉपिक्स को बाय-बाय कह दिया गया। वहीं इतिहास के सिलेबस से इस्लामिक इतिहास और साम्प्रदायिकता से जुड़े कुछ चैप्टर्स भी निकाल दिए गए। और हां, कुछ किताबें जो पहले से ही विवादों में घिरी हुई थीं, उन्हें भी रास्ता दिखा दिया गया।

DU प्रशासन का कहना है कि ये सब “शैक्षणिक संवेदनशीलता” के नाम पर किया गया है। कुछ टीचर्स का तर्क है कि इससे छात्रों को “तटस्थ शिक्षा” मिलेगी। पर सवाल ये है कि क्या विवादित विषयों को हटाना ही एकमात्र समाधान है? मेरे ख्याल से तो नहीं।

किसने क्या कहा? प्रतिक्रियाओं का दिलचस्प सिलसिला

इस फैसले पर प्रतिक्रियाएं बिल्कुल मिली-जुली रही हैं। कुछ छात्र और प्रोफेसर तो आग बबूला हो गए हैं। उनका कहना है कि ये “शैक्षणिक स्वतंत्रता पर हमला” है। और सच कहूं तो, उनकी बात में दम भी है। विवादास्पद विषयों को हटाने के बजाय उन पर खुलकर बहस होनी चाहिए। नहीं?

राजनीतिक दलों ने भी इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया। विपक्ष वालों ने इसे “इतिहास को मिटाने की साजिश” बताया है। वहीं सत्ता पक्ष के नेताओं ने “राष्ट्रीय हित” का कार्ड खेला है। शिक्षाविदों की एक बड़ी संख्या को डर है कि इससे छात्रों की सोच सीमित हो जाएगी। और ये डर बिल्कुल वाजिब लगता है।

आगे क्या? 5 पॉइंट्स में समझिए पूरा गणित

1. कुछ छात्र संगठन विरोध प्रदर्शन की तैयारी में हैं – देखना है कितना असर होता है
2. DU प्रशासन अपने फैसले पर अड़ा रहेगा या पीछे हटेगा?
3. क्या अन्य यूनिवर्सिटीज भी ऐसे बदलाव करेंगी?
4. UGC और शिक्षा मंत्रालय की प्रतिक्रिया क्या होगी?
5. केंद्र सरकार को इस मामले में आखिरकार बोलना पड़ेगा या नहीं?

एक बात तो तय है – ये मामला शैक्षणिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बीच की खाई को और गहरा रहा है। अंत में यही कहूंगा कि DU के इस कदम ने शिक्षा, इतिहास और राष्ट्रवाद पर नई बहस छेड़ दी है। अब देखना है कि ये बहस किस मोड़ पर जाकर रुकती है। और सबसे बड़ा सवाल – क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था इससे प्रभावित होगी? वक्त ही बताएगा।

आपकी क्या राय है इस पूरे मामले में? कमेंट में जरूर बताइएगा!

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दिल्ली यूनिवर्सिटी का ये नया फैसला… सच कहूं तो मुझे लगता है ये फिर से वही पुरानी कहानी है – शिक्षा और राजनीति का खेल। देखिए न, syllabus से ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ और ‘इस्लाम’ जैसे टॉपिक्स हटा दिए गए हैं। अब सवाल यह है कि ये कदम सही है या गलत? कुछ लोग कहेंगे ये academic freedom पर रोक है, तो कुछ का मानना होगा कि ये एक संतुलित decision था।

मेरी निजी राय? ईमानदारी से कहूं तो मैं खुद दुविधा में हूं। एक तरफ तो sensitive topics पर खुलकर बहस होनी चाहिए, लेकिन दूसरी तरफ… क्या आपने कभी DU के कैंपस में देखा है कैसे ये मुद्दे हंगामे में बदल जाते हैं? बिल्कुल आग लगा देने वाला माहौल!

छात्रों पर इसका क्या असर पड़ेगा? असल में, ये तो time ही बताएगा। पर मेरे कुछ professor दोस्तों का कहना है कि… (यहां थोड़ा रुककर सोचते हुए)… इससे critical thinking पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। वहीं दूसरी ओर, administration का तर्क है कि ये campus harmony के लिए जरूरी था।

एक बात तो clear है – ये debate लंबे समय तक चलने वाली है। और हां, अगर आप DU के इस पूरे controversy की details जानना चाहते हैं…

DU Syllabus से Hindu Nationalism और Islam के Chapters हटे – क्या है पूरा मामला?

1. भईया, DU ने syllabus से Hindu Nationalism और Islam के chapters ही क्यों हटा दिए?

देखिए, DU वालों का कहना है कि ये सब curriculum को ‘update’ करने के लिए किया गया है। पर सच बताऊं? हर बार यही बहाना चलता है। University का दावा है कि experts की सलाह पर ये फैसला लिया गया। लेकिन कौनसे experts? क्या criteria? ये सवाल तो उठना ही है।

2. सुनने में आ रहा है कि political pressure की वजह से हटाए गए हैं?

अरे भाई, University तो मुंह फेरकर बोल रही है – “नहीं नहीं, ये तो routine process है।” पर आप ही बताइए, जब एक साथ दो sensitive topics हटें, तो सवाल तो उठेंगे ही न? मेरा मानना है कि transparency होनी चाहिए थी।

3. जो हटा तो ठीक है, लेकिन नया क्या आया syllabus में?

तो सुनिए! अब gender studies, environmental issues जैसे contemporary topics add किए गए हैं। DU का कहना है कि इससे students को आज के दौर के लिए तैयार किया जा सकेगा। एक तरफ तो ये अच्छी बात है… पर क्या पुराने topics को हटाकर नए लाना ही एकमात्र विकल्प था?

4. ये changes final हैं या फिर कभी पलट भी सकते हैं?

वैसे तो University कह रही है कि syllabus तो हमेशा बदलता रहता है। मतलब आगे चलकर फिर से review हो सकता है। पर एक बात clear है – अभी के लिए तो students को नए syllabus के साथ ही adjust करना होगा। क्या पता, अगली बार फिर कुछ नया experiment कर दें!

सच कहूं तो, ये पूरा मामला थोड़ा suspicious लगता है। क्या आपको नहीं लगता?

Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com

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