मालेगांव ब्लास्ट केस: साध्वी प्रज्ञा बरी, पर सवालों के घेरे में जांच एजेंसियां
अरे भाई, कभी-कभी कोर्ट के फैसले सचमुच हैरान कर देते हैं। मालेगांव ब्लास्ट केस में साध्वी प्रज्ञा समेत सभी आरोपियों की बरी हो गई? 14 साल बाद? सच कहूं तो ये फैसला पढ़कर मेरा भी सिर हिल गया। असल में, विशेष ATS कोर्ट ने तो जैसे पूरी जांच प्रक्रिया पर ही सवालिया निशान लगा दिया है। RDX के सबूत नहीं, वाहन की पहचान संदिग्ध… ये सब पढ़कर तो यही लगता है कि कहीं न कहीं जांच में गड़बड़ी जरूर रही होगी।
2008 का वो काला दिन: क्या हुआ था असल में?
याद कीजिए 2008 का वो दिन… 29 सितंबर। मालेगांव में धमाका, 6 मासूमों की जान गई। ATS ने तुरंत हिंदू आतंकवाद का कोण पकड़ लिया। साध्वी प्रज्ञा पर केस, स्कूटर का मामला… सब कुछ बड़ा ड्रामेटिक लग रहा था। पर अब? देखा जाए तो जांच की नींव ही कमजोर निकली। कोर्ट ने तो ऐसा झटका दिया है कि ATS के दावों की हवा निकल गई।
कोर्ट ने क्यों काट दिए ATS के दावे?
अब सुनिए कोर्ट की मुख्य दलीलें – और ये सच में चौंकाने वाली हैं:
पहली और सबसे बड़ी बात – RDX का सबूत ही नहीं! ये उतना ही अजीब है जितना कि बिना आटे के रोटी बनाना। दूसरा, वो कथित स्कूटर… जिसके बारे में ATS का दावा था कि वो साध्वी प्रज्ञा की थी। कोर्ट ने साफ कहा – चेसिस नंबर क्लियर नहीं, इंजन नंबर संदिग्ध। मतलब? बेसिक जांच में ही लापरवाही!
तीसरा प्वाइंट तो और भी गंभीर – गवाहों के बयानों में फर्क! ऐसे में कोर्ट कैसे मान लेता कि आरोप साबित हो गए? सच कहूं तो ये केस तो जैसे जांच एजेंसियों की फेलियर की केस स्टडी बन गया है।
फैसले के बाद: किसने क्या कहा?
रिएक्शन्स की बात करें तो साध्वी प्रज्ञा ने तो जैसे मोर्चा ही ले लिया – “सच की जीत” बताया। पर दूसरी तरफ, पीड़ित परिवार? उनकी निराशा समझी जा सकती है। 14 साल इंतजार के बाद ये नतीजा?
राजनीति वालों ने तो अपना-अपना राग अलापना शुरू कर दिया। BJP “न्याय की जीत” बता रही है, कांग्रेस जांच पर सवाल उठा रही है। पर असल सवाल तो ये है कि आखिर हुआ क्या था? क्या सचमुच जांच एजेंसियों ने झूठा केस बनाया? या फिर सबूतों को सही तरीके से पेश नहीं किया गया?
आगे क्या? 3 बड़े सवाल जो अभी अनुत्तरित हैं
पहला – क्या अब ATS और अन्य एजेंसियां अपनी जांच प्रक्रिया सुधारेंगी? दूसरा – क्या जांच अधिकारियों के खिलाफ कोई एक्शन होगा? और तीसरा, सबसे संवेदनशील – क्या ये फैसला “हिंदू आतंकवाद” की बहस को फिर से जन्म देगा?
एक बात तो तय है – ये फैसला सिर्फ एक केस का अंत नहीं है। ये तो भारतीय न्याय प्रणाली के लिए एक बड़ा सबक है। जांच में पारदर्शिता, सबूतों का सही प्रेजेंटेशन… ये सब कितना जरूरी है, ये केस हमें फिर से याद दिला गया है। सच कहूं तो, ऐसे संवेदनशील मामलों में तो और भी ज्यादा सतर्कता की जरूरत होती है।
क्या सीख मिली? शायद ये कि न्याय प्रक्रिया में जल्दबाजी कभी अच्छी नहीं होती। चाहे वो जांच एजेंसियों की हो, या फिर हमारी – जनता की। सच सामने आने में वक्त लगता है… इस केस में तो पूरे 14 साल!
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