मालेगांव केस में कर्नल पुरोहित बरी – पर क्या मिल पाएगा उनका खोया हुआ 17 साल?
सोचिए, 17 साल। इतने लंबे समय तक अदालतों के चक्कर काटना… और फिर आखिरकार बरी होना। कर्नल प्रशांत पुरोहित के लिए ये कोई साधारण फैसला नहीं, बल्कि एक जीत है जिसकी कीमत उन्होंने अपना पूरा करियर देकर चुकाई है। हाँ, सेना ने उन्हें वापस active duty पर ले लिया है, लेकिन असली सवाल तो ये है कि क्या वो उन्हें वो सब वापस दे पाएगी जो इस लंबी कानूनी लड़ाई में छिन गया? प्रमोशन, सम्मान, वो साल जो वो अपने परिवार के साथ बिता सकते थे… ये सब तो अब सिर्फ एक सपना रह गया है।
2008 का वो दिन जब सब बदल गया
29 सितंबर 2008 – मालेगांव में धमाका हुआ, 6 लोग मारे गए। और फिर? फिर तो जैसे कर्नल पुरोहित की ज़िंदगी ही उलट गई। आरोप लगा कि वो किसी आतंकवादी से जुड़े हैं। सच्चाई चाहे जो भी हो, लेकिन ये केस तो भारतीय न्याय व्यवस्था की उस कड़वी सच्चाई को दिखाता है जहाँ “निर्दोष तब तक निर्दोष नहीं जब तक साबित न हो जाए” वाला सिद्धांत सिर्फ किताबों में ही अच्छा लगता है। 2016 में ही NIA ने मान लिया था कि सबूत कमज़ोर हैं, फिर भी केस चलता रहा। है न मजेदार बात?
कोर्ट ने बरी किया, पर क्या सेना कर पाएगी इंसाफ?
तो अब कर्नल साहब वापस active duty पर हैं। बढ़िया! लेकिन… हमेशा एक लेकिन होता है न? उनकी पोस्टिंग अभी भी मुंबई और आसपास ही है। वो अभी भी Colonel हैं जबकि उनके साथी Brigadier बन चुके हैं। सेना के नियम तो नियम हैं – वो कहेंगे “हम न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान करते हैं”, लेकिन क्या वाकई ये इंसाफ है? एक ऑफिसर जिसने देश के लिए अपनी ज़िंदगी दांव पर लगा दी, उसके साथ ऐसा… सच में दुख होता है सुनकर।
जीत तो मिली, पर क्या मिला?
कर्नल पुरोहित का कहना साफ है – “मेरा करियर तो बर्बाद हो चुका है।” और सच कहूँ तो वो ग़लत नहीं हैं। उनके परिवार की आँखों में भले ही खुशी के आँसू हों, लेकिन दर्द भी तो साफ झलकता है। सेना में भी ये मुद्दा गरमा रहा है – आखिर ऐसे मामलों में संस्था को क्या करना चाहिए? नियमों की दुहाई देकर पीछे हट जाएँ, या फिर इंसाफ की नई मिसाल कायम करें?
अब आगे क्या? क्या मिलेगा कर्नल साहब को?
सबसे बड़ा सवाल यही है न? क्या सेना उन्हें विशेष promotion देगी? क्या उन्हें compensation मिलेगा? और सबसे अहम – क्या वो अपने अब Brigadier बन चुके साथियों के सामने सिर उठाकर खड़े हो पाएँगे? ये सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम की कमियों का आईना है। जिसमें एक इंसान की पूरी ज़िंदगी दाँव पर लग जाती है, और फिर चाहे वो बरी भी हो जाए, तो भी… खोया हुआ कुछ वापस नहीं आता।
सिर्फ एक फैसला नहीं, एक सबक
देखिए, कर्नल पुरोहित का मामला तो सिर्फ एक उदाहरण है। असली सवाल तो ये है कि हमारी व्यवस्था ऐसे लोगों के साथ कैसा व्यवहार करती है। सेना हो या कोर्ट – क्या हम सच में “न्याय में देरी न्याय से इनकार है” वाली बात को समझ पाए हैं? कर्नल साहब की कहानी हम सबके लिए एक सबक है – कि कभी भी, किसी के साथ भी ऐसा हो सकता है। और तब… तब शायद हम समझ पाएँगे कि ये सिर्फ एक केस नहीं, बल्कि हमारे सिस्टम का सच्चा चेहरा है।
मालेगांव केस से बरी होकर कर्नल पुरोहित अब नई ज़िंदगी की शुरुआत करने को तैयार हैं, पर सच कहूं तो यह इतना आसान नहीं। ख़ासकर तब, जब आपका पुराना साथी अब ब्रिगेडियर बन चुका हो और बीच में कुछ अनसुलझे तनाव हों। है न मुश्किल स्थिति?
असल में यह केस सिर्फ़ क़ानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि इंसानी रिश्तों और भरोसे की भी कहानी है। कोर्ट ने फ़ैसला दे दिया, लेकिन क्या ज़िंदगी की अदालत में यह केस सच में ख़त्म हो पाएगा? वैसे भी, ऐसे मामलों का आख़िरी अध्याय कभी-कभी काग़ज़ों में नहीं, दिलों में लिखा जाता है।
*(थोड़ा सोचने वाली बात है, है न?)*
मालेगांव केस में कर्नल पुरोहित – सच्चाई क्या है और आगे क्या होगा?
1. सवाल यह है कि आखिर कर्नल पुरोहित को क्यों बरी किया गया?
देखिए, मामला कुछ ऐसा है – Court ने साफ कहा कि CBI के पास कोई ठोस सबूत नहीं था। और सच कहूं तो, जांच में इतनी गड़बड़ियां थीं कि किसी को भी शक हो जाए। ऐसे में, बरी होना तो तय था।
2. अब बड़ा सवाल: क्या वापसी हो पाएगी सेना में?
हालांकि technically तो हां, लेकिन… यहां एक बड़ा ‘लेकिन’ है। सेना के rules हैं ना? Medical fitness से लेकर service review तक – process उतना आसान नहीं जितना लगता है। समझ रहे हैं न मेरा मतलब?
3. साथी officers के साथ तनाव – असली वजह क्या है?
ईमानदारी से कहूं तो, ये केस सिर्फ कानूनी नहीं, एक सामाजिक त्रासदी भी है। जब सबसे ज्यादा साथ की जरूरत थी, तब कुछ ‘साथियों’ ने पीठ दिखा दी। और अब? Rank का फर्क तो है ही… बात बनती नहीं दिख रही।
4. Compensation की गुंजाइश कितनी?
Legal experts की मानें तो… हां, कोशिश तो की जा सकती है। पर याद रखिए, भारत में wrongful prosecution के cases में compensation पाना लगभग उतना ही मुश्किल है जितना ऊंट को सुई की नोक पर खड़ा करना! सालों लग जाते हैं, और नतीजा? कोई गारंटी नहीं।
एक बात और – ये सिर्फ एक केस नहीं, हमारे सिस्टम पर सवाल है। सोचिएगा जरूर।
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