13 जुलाई 2011: मुंबई के वो तीन धमाके जिनका दर्द आज भी कम नहीं हुआ
मुंबई। ये नाम सुनते ही क्या दिमाग में आता है? बॉलीवुड? समंदर? या फिर…आतंक? सच तो ये है कि हमारी ये सपनों की नगरी बार-बार आतंकवादियों के निशाने पर आई है। और 13 जुलाई 2011 की शाम तो शायद ही कोई मुंबईकर भूल पाए। झवेरी बाजार, ओपेरा हाउस और दादर – तीन अलग-अलग जगहों पर एक के बाद एक धमाके। 20 बेगुनाहों की जान चली गई। 130 से ज्यादा लोग जख्मी हुए। सच कहूं तो, ये सिर्फ आंकड़े नहीं हैं…ये हमारे दिलों में गहरे घाव हैं जो आज भी ताज़ा हैं।
असल में देखा जाए तो मुंबई को आतंकवाद का सामना करने की आदत सी हो गई है। 1993 के धमाकों से लेकर 2006 की लोकल ट्रेन ब्लास्ट और फिर 26/11…लेकिन 2011 का ये हमला कुछ अलग था। आतंकियों ने जानबूझकर भीड़-भाड़ वाली जगहों को चुना था। सोचिए, शाम के 6-7 बजे…ऑफिस से लौटते लोग…रास्ते में खरीदारी करते लोग…और फिर अचानक…बम! पुलिस और एजेंसियों ने तुरंत कार्रवाई शुरू की, कुछ लोगों को पकड़ा भी गया। पर ये कोई आम घटना नहीं थी। एक सुनियोजित साजिश थी। बिल्कुल फिल्मी स्टाइल में।
14 साल गुजर गए…लेकिन क्या हमें इंसाफ मिला? कुछ आरोपियों को सजा तो हुई, पर असली दिमाग तो अभी भी आज़ाद घूम रहे हैं। हां, CCTV कैमरे बढ़ गए हैं, intelligence network मजबूत हुआ है…पर क्या ये काफी है? सच पूछो तो, हर बार धमाके होने के बाद हम यही सवाल पूछते हैं न?
इन पीड़ित परिवारों की आवाज़ सुनिए: “हमें मुआवजा नहीं, इंसाफ चाहिए!” राजनेता बड़े-बड़े भाषण देते हैं – “आतंकवाद के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी!” Security experts चेतावनी देते हैं – “मुंबई को अभी भी खतरा है!” पर सवाल ये है कि…कब तक? कब तक हम ऐसी त्रासदियों का इंतज़ार करते रहेंगे?
आगे का रास्ता? देखिए, जांच तो चल ही रही है, शायद कुछ और गिरफ्तारियां भी हों। सरकार को नई policies बनानी होंगी। पर सबसे ज़रूरी बात? आम आदमी की सतर्कता। वो चौकन्नी नज़र जो किसी भी शक की गतिविधि को पहचान सके।
13 जुलाई 2011…एक तारीख जो मुंबई के दिल से कभी नहीं मिटेगी। ये सिर्फ एक दुखद घटना नहीं, एक सबक है। एक चेतावनी है कि आतंकवाद से लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई। और जब तक हम सब मिलकर इसका मुकाबला नहीं करते…ये घाव भरने वाले नहीं।
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Source: Navbharat Times – Default | Secondary News Source: Pulsivic.com