pakistan demolishes 70 year old ahmadiyya worship site 20250731215357092202

पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय का 70 साल पुराना इबादत स्थल ध्वस्त – पुलिस कार्रवाई पर बवाल

पाकिस्तान में अहमदिया समुदाय का 70 साल पुराना इबादत स्थल गिराया गया – क्या यह सिर्फ कानून का मामला है या धार्मिक उत्पीड़न?

एक बार फिर पाकिस्तान के पंजाब में अहमदिया समुदाय को निशाना बनाया गया है। और इस बार तो उनका 70 साल पुराना इबादत स्थल ही बुलडोज़र के नीचे दब गया। सोचिए, कोई इमारत जो आपके दादा-परदादा के ज़माने से खड़ी थी, वो एक पल में ढहा दी जाए? है ना दिल दहला देने वाली बात? असल में ये सिर्फ एक इमारत का मामला नहीं, बल्कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की हालत का आईना है। और हां, मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि ये खुला धार्मिक उत्पीड़न है।

पीछे की कहानी: क्यों अहमदिया हैं निशाने पर?

देखिए, यहां समझने वाली बात ये है कि 1974 से ही पाकिस्तान में अहमदियों को ‘गैर-मुस्लिम’ घोषित कर दिया गया था। मतलब साफ है – उनके लिए मस्जिद कहलाना तो दूर, ‘इबादत’ शब्द का इस्तेमाल करना भी गुनाह है! अब इसी बहाने उनके धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया जाता रहा है। प्रशासन का कहना है कि ये इमारत अवैध थी। पर सवाल ये उठता है – क्या 70 साल तक कोई अवैध इमारत खड़ी रह सकती है? थोड़ा अजीब लगता है ना?

क्या हुआ असल में?

सीन कुछ ऐसा था – भारी पुलिस बल, बुलडोज़र, और फिर… ढह गई वो इमारत जहां तीन पीढ़ियों ने प्रार्थना की थी। समुदाय के लोगों ने विरोध किया, पर उनकी आवाज़ दबा दी गई। अहमदिया नेताओं का कहना है कि ये कोई अकेली घटना नहीं, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है। और सच कहूं तो आंकड़े भी उनकी बात का समर्थन करते हैं। पिछले कुछ सालों में दर्जनों अहमदिया पूजा स्थलों को निशाना बनाया जा चुका है।

किसने क्या कहा?

अहमदिया प्रवक्ता का कहना साफ है – “ये हमारे मूल अधिकारों का उल्लंघन है।” वहीं मानवाधिकार संगठनों ने सरकार को घेरते हुए कहा है कि संविधान सबको बराबर का हक देता है। पर स्थानीय अधिकारियों का जवाब? वो तो बस रटा-रटाया सा लगता है – “हमने तो बस कानून का पालन किया।” सच्चाई जो भी हो, एक बात तो तय है – ये मामला अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठेगा।

अब क्या?

अब सवाल ये है कि आगे क्या होगा? अहमदिया समुदाय ने विदेशी मंचों पर मामला उठाने की बात कही है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे पाकिस्तान की छवि को और ठेस पहुंचेगी। पर क्या सरकार इस पर कोई एक्शन लेगी? या फिर ये सिलसिला और आगे बढ़ेगा? देखना दिलचस्प होगा। एक तरफ तो धार्मिक कट्टरपंथ है, दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय दबाव। सरकार किस रास्ते जाएगी?

(FILE PHOTO: ध्वस्त हुए इबादतगाह की तस्वीर – जहां अब सिर्फ मलबा बचा है)

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पाकिस्तान में अहमदिया इबादतगाह गिराया गया – क्या यह सिर्फ़ एक इमारत का मामला है?

1. आखिर क्यों उखाड़ दिया गया 70 साल पुराना अहमदिया इबादतगाह?

सुनकर हैरानी होगी कि पंजाब प्रांत में खड़ी एक इमारत, जो 70 साल से अहमदिया समुदाय की आस्था का केंद्र थी, अचानक “बिना अनुमति” वाली हो गई। सरकारी दावे तो यही हैं, लेकिन सच क्या है? अहमदिया समाज के लोग बिल्कुल साफ़ कह रहे हैं – यह धार्मिक नहीं, राजनीतिक कार्रवाई है। और सच कहूं तो, पाकिस्तान के हालात देखते हुए उनकी बात में दम तो लगता है।

2. पुलिस की भूमिका: सुरक्षा या दमन?

तस्वीर कुछ यूं बनी – पुलिस ने पूरे इलाके को कड़े सुरक्षा घेरे में ले लिया। जैसे कोई आतंकवादी ऑपरेशन हो! अहमदिया समुदाय के लोगों को तो मुंह खोलने तक नहीं दिया गया। और हां, force का इस्तेमाल? वो तो हुआ ही। कुछ eyewitnesses बताते हैं कि लाठीचार्ज तक की नौबत आ गई थी। सवाल यह है कि क्या यह सब एक शांतिपूर्ण धार्मिक स्थल के लिए ज़रूरी था?

3. पाकिस्तान में अहमदिया होना क्यों है इतना मुश्किल?

यहां तो मामला सिर्फ़ इबादतगाह तक सीमित नहीं। असलियत यह है कि पाकिस्तान में अहमदियों को कानूनी तौर पर ही गैर-मुस्लिम घोषित कर दिया गया है। सोचिए! आप अपने आप को मुस्लिम कहें तो अपराध, मस्जिद जैसी इमारत बनाएं तो गुनाह। क्या यह धार्मिक स्वतंत्रता है? और तो और, हिंसा के मामले तो आए दिन सामने आते रहते हैं। एक तरफ़ तो पाकिस्तान खुद को इस्लामिक देश कहता है, दूसरी तरफ़ अपने ही नागरिकों को उनके मूल अधिकारों से वंचित रखता है। विरोधाभास नहीं तो और क्या है?

4. दुनिया ने क्या कहा इस घटना पर?

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मामले ने तूफान खड़ा कर दिया। UN से लेकर Amnesty International जैसी human rights organizations तक – सभी ने पाकिस्तान सरकार को खरी-खोटी सुनाई। अमेरिका और यूरोपीय देशों ने भी अपनी चिंता जताई है। पर सवाल यह है कि क्या यह सब सिर्फ़ कागज़ी खानापूर्ति है? क्योंकि ज़मीनी हालात तो बदलते नहीं दिख रहे। एक तरफ़ तो पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर धार्मिक सहिष्णुता की बात करता है, दूसरी तरफ़ अपने ही देश में अल्पसंख्यकों के साथ यह सब। क्या आपको नहीं लगता कि यह दोहरा मापदंड है?

Source: NDTV Khabar – Latest | Secondary News Source: Pulsivic.com

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