“क्या चुनाव आयोग को मिलनी चाहिए असीमित शक्ति? पूर्व CJIs ने ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ पर उठाए गंभीर सवाल”

क्या चुनाव आयोग को मिलनी चाहिए असीमित ताक़त? या फिर ये हमारे लोकतंत्र के लिए खतरा है?

देखिए, भारत के लोकतंत्र में ये नया विवाद किसी सांप-सीढ़ी के खेल जैसा लग रहा है – एक कदम आगे, दो कदम पीछे! दो पूर्व CJIs – जस्टिस खेहर और जस्टिस चंद्रचूड़ – ने ‘One Nation One Election‘ पर जो सवाल उठाए हैं, वो सुनकर तो लगता है कि मामला गंभीर है। असल में, उनकी चिंता साफ है: अगर चुनाव आयोग को बिना किसी लगाम के शक्तियां दे दी गईं, तो क्या ये हमारे संविधान की बुनियाद को हिला देगा? सोचिए, ये वही आयोग है जिसे हम चुनावों का निष्पक्ष रेफरी मानते हैं। अगर रेफरी ही खेल बदल दे, तो?

पूरा माजरा क्या है? समझते हैं…

पिछले कुछ सालों से ये ‘एक देश, एक चुनाव’ वाली बात चल रही है। सरकार का कहना है – भई, इतने चुनाव, इतना खर्चा, सुरक्षा बलों की परेशानी… एक साथ निपटा दो सब! लेकिन यहां दिक्कत कहां आई? जब उस हाई-लेवल कमेटी ने चुनाव आयोग को और ज्यादा अधिकार देने की सिफारिश की। अब सवाल ये कि क्या हम किसी संस्था को इतनी ताकत दे सकते हैं? वो भी बिना किसी चेक-बैलेंस के? ठीक वैसे ही जैसे किसी को बंदूक थमा दो और कहो – “भई, खुद ही तय कर लेना कब और कहां चलानी है!”

पूर्व CJIs ने क्या कहा? बिल्कुल साफ शब्दों में!

जस्टिस खेहर और चंद्रचूड़ ने तो जैसे इस बिल को लेकर रेड फ्लैग ही उठा दिया है। उनका कहना है कि आयोग को दी जा रही ये असीमित शक्तियां संविधान के अनुच्छेद 324 की भावना के खिलाफ हैं। सीधी बात – ये तो वैसा ही है जैसे किसी गोलकीपर को ये अधिकार दे दो कि वो मैच के नियम ही बदल दे! और राज्यों की बात? अरे भई, बिना पूछे उनके चुनावी कैलेंडर में छेड़छाड़? ये तो संघीय ढांचे पर सीधा प्रहार होगा। इन जानकारों का सुझाव साफ है – लगाम लगाओ, संतुलन बनाओ।

राजनीति के मैदान में क्या चल रहा है?

अब यहां दिलचस्प बात ये कि हर कोई अलग राग अलाप रहा है। केंद्र कह रहा है – “यूनिटी और एफिशिएंसी के लिए जरूरी है”। विपक्ष चिल्ला रहा है – “ये तो राज्यों के अधिकारों की हत्या है!” कानून के जानकारों की एक बड़ी संख्या चिंता जता रही है कि कहीं ये हमारे चुनावी संस्थान को ही बदलने की कोशिश तो नहीं? सच कहूं तो, ये वही पुरानी कहावत सच साबित होती दिख रही है – “ज्यादा ताकत, ज्यादा खतरा!”

आगे क्या? एक बड़ा सवाल…

अब सरकार इस बिल को लाने की तैयारी में है, पर रास्ता आसान नहीं। अगर पास भी हो गया, तो सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया जाएगा – ये तय है। और राज्यों का गुस्सा? वो तो फूटेगा ही, खासकर जहां विपक्ष की सरकारें हैं। असल में, ये पूरा मामला हमारे लोकतंत्र की उस नाजुक डोर को दिखा रहा है जिस पर हमेशा संतुलन बनाए रखना पड़ता है। अगले कुछ महीने… वाकई दिलचस्प होंगे। क्योंकि यहीं तय होगा कि हमारा लोकतंत्र किस राह पर चलेगा।

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Source: Navbharat Times – Default | Secondary News Source: Pulsivic.com

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