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“तेजस्वी का राघोपुर सीट से मोह: हार का डर या परिवार का दबाव? जानें पूरी कहानी”

तेजस्वी का राघोपुर सीट से मोह: क्या ये हार का डर है या फिर ‘परिवार’ वाली बात?

अरे भई, तेजस्वी यादव का राघोपुर सीट से ये लगाव अब सवालों के घेरे में है। सच कहूँ तो, चुनाव आयोग की वो ‘विशेष पुनरीक्षण’ वाली प्रक्रिया और दो voter ID का मामला… ये सब कुछ ऐसा लग रहा है जैसे किसी political thriller की स्क्रिप्ट चल रही हो। पर सवाल ये है कि – क्या ये सच में हार के डर की वजह है या फिर वो पुरानी ‘परिवार वाली मजबूरी’? आपको क्या लगता है?

पूरा माजरा क्या है?

देखिए, राघोपुर सीट पर तेजस्वी की पिछली जीत तो याद ही होगी। लेकिन इस बार… अब बात बन नहीं रही। चुनाव आयोग ने जो पुनरीक्षण शुरू किया है, उसमें दो voter ID वाला केस तो बस शुरुआत है। विपक्ष तो मानो जैसे ‘गोट यू’ मोड में आ गया है – नियम तोड़ने के आरोप लगा-लगाकर। और RJD? वो ‘डैमेज कंट्रोल’ में जुटी हुई है। स्थिति तब और गंभीर हो गई जब आयोग ने committee बना डाली। अब ये committee वाला शब्द सुनकर ही पता चल जाता है कि मामला गंभीर है ना?

अभी तक क्या हुआ?

ताजा अपडेट ये है कि चुनाव आयोग ने तेजस्वी के documents verify करने के लिए टीम बना दी है। RJD इसे ‘पूरा षड्यंत्र’ बता रही है। मजे की बात ये कि स्थानीय नेता अभी से ‘प्लान बी’ की बात करने लगे हैं। अगर – मैं अगर कह रहा हूँ – तेजस्वी की उम्मीदवारी रद्द हुई तो? ये महागठबंधन के लिए वाकई में बड़ा झटका होगा। खासकर तब, जब बिहार की राजनीति गरमा रही है। ऐसे में ये मामला सिर्फ एक सीट तक सीमित नहीं रहने वाला।

कौन क्या बोला?

RJD वाले तो अपने स्टाइल में बोल ही रहे हैं – “सरकार की साजिश!” वहीं BJP वाले अपनी पुरानी रट लगा रहे हैं – “नियम तोड़ा है तो सज़ा मिलनी चाहिए!” पर असली मजा तो स्थानीय voters के रिएक्शन में है। एक voter ने तो बड़ा सटीक कहा – “ये सब नाटक है… अगर तेजस्वी नहीं तो हमारा भरोसा भी नहीं!” सच कहूँ तो, जनता की ये बात सबसे ज़्यादा मायने रखती है।

अब आगे क्या?

असल मामला तो चुनाव आयोग की रिपोर्ट आने के बाद ही साफ होगा। लेकिन मैं आपको बताता हूँ – अगर तेजस्वी बाहर हुए तो… ये गेम पूरी तरह बदल जाएगा। RJD को नया face ढूंढना होगा, महागठबंधन को नई रणनीति बनानी होगी। और विपक्ष? वो तो मानो जैसे शिकार की तलाश में बैठा है। कुछ experts तो ये भी कह रहे हैं कि ये मामला अब चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि पूरी तरह political chess game बन चुका है।

आखिर में बस इतना – बिहार की सियासत में ये मामला एक नया मोड़ ला सकता है। तेजस्वी का भविष्य हो या RJD की रणनीति… सब कुछ अब इसी पर निर्भर करेगा। और हम? हमारा काम है बैठकर पॉपकॉर्न खाते हुए ये सब देखना। क्योंकि बिहार की राजनीति कभी निराश नहीं करती!

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भईया, तेजस्वी ने राघोपुर को ही क्यों चुना?

असल में बात ये है कि तेजस्वी यादव को राघोपुर से दो-तीन फायदे नज़र आए होंगे। पहला तो ये कि यहाँ उनकी पार्टी का मज़बूत विरोधी है, जिसे हराकर वो अपनी राजनीतिक पकड़ दिखा सकते हैं। दूसरा… शायद फैमिली का दबाव भी हो? कौन जाने! पर इतना तो तय है कि ये कोई आंख मूंदकर लिया गया फैसला नहीं है।

हार का डर? सच बताऊँ तो…

देखिए, राजनीति में हार-जीत तो लगी रहती है। कोई भी नेता ये नहीं कहता कि उसे डर नहीं लगता। लेकिन तेजस्वी की बॉडी लैंग्वेज देखें तो लगता है वो कॉन्फिडेंट हैं। उनका पूरा फोकस जीत की स्ट्रैटेजी पर है, न कि ‘अगर हार गए तो…’ वाले सोच पर। समझ रहे हैं न?

राघोपुर में कौन-कौन खेल रहा है मैच?

अभी तो पूरा खेल ही कार्ड्स के पत्तों जैसा है। BJP वाले किसे उतारेंगे, कुछ रीजनल पार्टियाँ भी मैदान में होंगी… असली नाम तो टिकट डिक्लेयर होने के बाद ही पता चलेगा। पर इतना तय है – यहाँ मज़ेदार मुकाबला देखने को मिलेगा!

RJD वालों ने सुना-सुनाकर ही दिया सपोर्ट, या सच में खुश हैं?

ऑफिशियली तो पूरी पार्टी एक सुर में तेजस्वी के साथ खड़ी है। पर… आप जानते ही हैं न? राजनीति में कभी-कभी ऑफिशियल स्टेटमेंट और दीवारों के पीछे की बातें अलग-अलग होती हैं। कुछ लीडर्स की चुप्पी भी बहुत कुछ कह जाती है। है न?

Source: News18 Hindi – Nation | Secondary News Source: Pulsivic.com

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